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आधी रात में दौड़ने वाले प्रदीप मेहरा की कहानी बेच रही मीडिया लेकिन ये सवाल कौन पूछेगा ?

02:34 PM Mar 23, 2022 IST | Sumit Chauhan
आधी रात में दौड़ने वाले प्रदीप मेहरा की कहानी बेच रही मीडिया लेकिन ये सवाल कौन पूछेगा
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एक 19 साल का लड़का जिसकी माँ हॉस्पिटल में भर्ती है लेकिन वो अपनी माँ के साथ नहीं रह सकता, एक युवा जो बस जवानी की दहलीज़ पर पहुँचने वाला है, वो कॉलेज जाने की जगह मैकडॉनल्ड में नौकरी करने को मजबूर है। 19 साल का प्रदीप मेहरा इस देश के हुक्मरानों, मीडिया और ओपनियन मेकर्स को उस तल्ख़ हक़ीक़त से रूबरू कराता है जिसे ये सब मिलकर जोश, हिम्मत, जज़्बे और लगन जैसे फरेबी शब्दों से ढक देना चाहते हैं।

सोशल मीडिया पर छाया प्रदीप मेहरा का वीडियो

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इन दिनों आपने सोशल मीडिया और टीवी पर एक भागते हुए लड़के वीडियो ज़रूर देखी होगी। 19 साल के प्रदीप मेहरा आजकल इंटरनेट की दुनिया से लेकर नोएडा की फ़िल्म सिटी के स्टूडियो तक में छाए हुए हैं। लेकिन इस वीडियो में वो कौन सी बात है जिसके बारे में ना ही सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है और ना ही न्यूज़ चैनल्स उसकी कोई चर्चा कर रहे हैं? इस वायरल वीडियो से जुड़े कुछ अहम सवालों पर हम आगे बात करेंगे लेकिन उससे पहले ये समझिए कि आखिर इस लड़के की ये वीडियो इतनी वायरल क्यों हो रही है।

रोज़ाना रात में दौड़ता है प्रदीप मेहरा 

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दरअसल 20 मार्च को वरिष्ठ पत्रकार और फ़िल्म मेकर विनोद कापड़ी ने अपने ट्विटर अकाउंट से 19 साल के प्रदीप मेहरा का वीडियो शेयर किया जिसमें प्रदीप नोएडा में आधी रात में दौड़ते हुए नज़र आ रहे हैं। प्रदीप नोएडा में बर्गर बेचने वाली कंपनी मैकडॉनल्ड के एक स्टोर में काम करता है, उसे सेना में भर्ती होना है लेकिन उसे काम की वजह से दौड़ने का समय नहीं मिलता इसलिए वो आधी रात में छुट्टी होते ही सड़क पर दौड़ने लग जाता है और क़रीब 10 किलोमीटर तक इसी तरह रोज़ाना दौड़ता है।

हौसला बढ़ाओ लेकिन जरूरी सवाल भी पूछो 

19 साल का एक युवा कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बैग लेकर नोएडा जैसे शहर में दौड़ता चला जा रहा है। निश्चित तौर पर उसे शाबाशी मिलनी चाहिए कि इतनी कम उम्र में वो अपने परिवार की मदद करने के साथ-साथ अपने सपने को भी सच करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। लेकिन क्या इन हौसलाअफ़जाई वाले शब्दों के साथ-साथ ये सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए एक 19 साल का लड़का अपनी आगे की पढ़ाई क्यों नहीं कर पाया? क्यों एक लड़का जिसकी माँ अस्पताल में भर्ती है, वो उसकी देखभाल के लिए उसके साथ भी नहीं रह सकता और उसे गुज़ारा करने के लिए आधी रात तक नौकरी करनी पड़ रही है ?

इस देश के हुक्मरानों से ये सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा है कि घर चलाने के लिए प्रदीप और उसके भाई को चंद हज़ार रुपये की नौकरी क्यों करनी पड़ रही है ? ये सवाल भी तो पूछा जाना चाहिए कि क्यों प्रदीप की माँ को उत्तराखंड के अल्मोड़ा में सही इलाज मुहैया नहीं हो पाया? सवाल तो ये भी उठता है कि प्रदीप जैसे लाखों युवा रोज़ सड़कों पर दौड़ते हैं, आर्मी और पैरामिलिट्री फोर्सेज़ में जाने की तैयारी करते हैं लेकिन उनके लिए भर्तियां क्यों नहीं निकलती ?

सेना में एक लाख से भी ज्यादा पद खाली हैं

सेना में भर्ती युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया है। सेना सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला संगठन है लेकिन इस वक्त सेना में एक लाख से भी ज्यादा पद खाली हैं। सोमवार को ही रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने राज्यसभा में लिखित जवाब दिया कि कोविड की वजह से सभी रिक्रूटमेंट रैली सस्पेंड की गई है। उन्होंने बताया कि 2020-21 में 97 रिक्रूटमेंट रैली की योजना थी जिसमें 47 रैली हो पाई। इनमें से भी सिर्फ चार रैली के कॉमन एंट्रेस एग्जाम किए गए, इसके बाद रिक्रूटमेंट एक्टिविटी रोक दी गई।

मीडिया कब निभाएगा अपनी जिम्मेदारी ?

मीडिया वाले प्रदीप को कभी स्टूडियो में दौड़ा रहे हैं तो कभी सड़क पर दौड़ते हुए उसके पीछे गाड़ी लेकर चल रहे हैं। कोई उसे मिल्खा सिंह कह रहा है तो आनंद महिंद्रा जैसे उद्योगपति उसे आत्मनिर्भर बता रहे हैं लेकिन कोई ये सवाल नहीं पूछ रहा कि आख़िर प्रदीप जैसे लाखों युवाओं को नौकरी कब मिलेगी ? कोई ये नहीं पूछ रहा कि आख़िरकार देश के युवाओं को यूँ लाचार क्यों होना पड़ रहा है ? कोई ये सवाल भी नहीं पूछ रहा कि हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा करने वाला मोदी सरकार सरकारी नौकरियाँ क्यों नहीं निकाल रही ? आख़िर क्यों इसे बेरोज़गारी से नहीं जोड़ा जा रहा ?

क्यों बेरोज़गारी पर चर्चा नहीं हो रही ? भारत के किसी भी कोने में आर्मी की भर्ती का कैंप लगता है तो कम से कम चालीस-पचास हज़ार युवा पहुँच जाते हैं। कई बार तो इतने युवा पहुँचते हैं कि भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, इसके पीछे सिर्फ़ मेहनत, लगन, जज़्बा और देशभक्ति ही नहीं बल्कि बेरोज़गारी भी बहुत बड़ी समस्या है जिसे बड़ी चतुराई से ऊर्जावान शब्दों के छलावे से ढका जा रहा है।

बेरोजगारी की चिंता क्यों नहीं है ?

हाँ प्रदीप मेहनत कर रहा है लेकिन उसकी मेहनत पर टीवी वाले टीआरपी बटोर रहे हैं और सोशल मीडिया एंफ्लुएंशर फोलोअर्स… असल मायनों में उसकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आएगा ? आज वीडियो वायरल है, कल इंटरनेट के तहख़ाने में गुम हो जाएगी। आपको बुधिया याद होगा, बुधिया 7 घंटे में 65 किलोमीटर भागा था जिसे मीडिया ने लपक लिया। उसपर फ़िल्म बनाई गई, फ़िल्म मेकर्स ने पैसे कमाए और बेस्ट चिल्ड्रन फ़िल्म का अवॉर्ड भी जीत लिया। मनोज वाजपेयी ने कोच का रोल किया। जो असली कोच था, उसका मर्डर हो गया। अब 20 साल का बुधिया भुवनेश्वर की झुग्गी बस्ती में एक कमरे में रहता है। उसकी ज़िंदगी जिस संघर्ष से शुरू हुई थी, उसी संघर्ष में फँसी हुई है।

मीडिया को प्रदीप मेहरा और बुधिया जैसे लोग बहुत भाते हैं, ख़बरों के कारोबारी इमोशंस को भी बहुत अच्छे से बेचते हैं। कभी बाबा का ढाबा सुर्ख़ियाँ बनता है तो कभी रानू मंडल जैसे लोग टीवी स्टूडियो में दिखाई देते हैं। लेकिन चंद रोज़ की इस चकाचौंध के बाद ऐसे लोग घुप अंधेरे में खो जाते हैं। ना ही इनके संघर्ष पर फिर कोई फ़िल्म बनाता है और ना ही इन्हें लाचार बना देने वाले सिस्टम से कोई सवाल पूछता है ?

नेताओं, अफसरों, कारोबारियों के बेटे ऐसे क्यों नहीं दौड़ते ?

क्या आपने प्रदीप की तरह किसी विधायक, सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री या बड़े बिज़नेसमैन के बेटे को यूँ आधी रात में दौड़ते हुए देखा है ? अगर नहीं तो क्यों? ये सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए। मेहरा जैसे युवाओं को इंस्पेरेशन बताकर ये एजेंडा परोसा जाता है कि अगर आप में दम है, आप में लगन है, हौसला और जज़्बा है तो आपको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता, बस आप मेहनत करते रहिए। आपको सफ़ला ज़रूर मिलेगी… लेकिन ना सत्ता से सवाल पूछिए और क्रांति के बारे में तो भूल ही जाइये क्योंकि क्रांति तो डेढ़ जीबी डेटा प्रति दिन के हिसाब से कहीं डाउनलोड हो रही है। इसे ही एजेंडा सेटिंग कहते हैं जो सत्ता के सेफ़्टी वॉल्व की तरह काम करता है।

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