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विमर्श : क्या सामाजिक न्याय के मुद्दे पर तमिलनाडु की सीमा लांघेंगे मुख्यमंत्री स्टालिन ?

05:27 PM Feb 13, 2022 IST | Sumit Chauhan
विमर्श   क्या सामाजिक न्याय के मुद्दे पर तमिलनाडु की सीमा लांघेंगे मुख्यमंत्री स्टालिन
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उत्तर भारत इस वक्त चुनावी भागदौड़ में लगा है और पेरियार की ज़मीन दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय के मुद्दे पर जबरदस्त हलचल हो रही है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन सोशल जस्टिस के मुद्दे पर जितनी गंभीरता और तेज़ी से काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए अभी ये तक कहा जाने लगा है कि स्टालिन को तमिलनाडु की सीमा लांघकर राष्ट्रीय राजनीति में सामाजिक न्याय के एजेंडे को स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए।

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सोशल जस्टिस से जुड़े मुद्दों पर जोर 

12 फरवरी को एमके स्टालिन ने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक प्रो दिलीप सी मंडल से मुलाकात की और ‘नेशनल सोशल जस्टिस फोरम’ बनाने की ओर कदम बढ़ाया। स्टालिन ने तमिलनाडु में EWS आरक्षण और NEET में OBC आरक्षण के मसले पर जितनी संजीदगी से काम किया, वैसा उत्तर भारत के नेता भी नहीं कर पाए। उन्होंने अपने सूबे में EWS आरक्षण को लागू करने से मना कर दिया, NEET में OBC आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की, मंदिरों में सभी जातियों के लोगों को पुजारी बनाया, मंदिर में दलित महिला से जातिभेद होने पर अपने मंत्री को भेज दिया, उनका काम करने का तरीका उन्हें बाकियों से अलग बनाता है।

स्टालिन के तेवर और नज़रिए को समझने के लिए यहां NEET के खिलाफ विधानसभा में दिए उनके भाषण को पढ़ा जाना चाहिए। उनके इस भाषण की खूब चर्चा हो रही है। उनके भाषण को हम यहां हिंदी में ट्रांसलेट करके लिख रहे हैं। इसे पढ़ें और स्टालिन की वैचारिकी को समझने की कोशिश करें।

माननीय अध्यक्ष महोदय, 

जब जनता द्वारा प्रतिनिधि चुनने के लिए भारत में चुनाव प्रणाली की स्थापना हुई तब मद्रास प्रांत में पहली बार चुनाव हुए थे। जब देश ब्रिटिश शासन के अधीन था तब द्रविड़ आंदोलन की अग्रदूत जस्टिस पार्टी ने 1920 के पहले आम चुनाव में सरकार बनाई थी।

मद्रास प्रांतीय सभा का कामकाज देखने के लिए इंग्लैंड से भारत आने वाले सभी लोगों द्वारा टिप्पणी की गई कि मद्रास भारत का एकमात्र प्रांत है जो कानून के शासन और प्रशासनिक प्रोटोकॉल द्वारा शासित है।

यह इस सदन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है, जिसने ऐसे लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की। हम सब यहाँ लोकतंत्र की रक्षा हेतु, लोकतंत्र की गरिमा और संघवाद के आदर्शों को अक्षुण्ण रखने के लिए और शिक्षा के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए एकत्रित हुए हैं।

हम यहाँ केवल NEET परीक्षा के बारे में बात करने के लिए एकत्रित नहीं हुए हैं। हम तमिलनाडु विधानसभा की संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा हेतु एकत्रित हुए हैं। संघवाद एक मौलिक विचार है जो वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप की जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करता है! हम यह सुनिश्चित करने के लिए एकत्रित हुए हैं कि महान संघीय दर्शन अक्षुण्ण रहे।

सोलह वर्ष की आयु में मैंने राजनीतिक जीवन में प्रवेश किया। यह वह दिन है जो मेरे सार्वजनिक जीवन के अविस्मरणीय दिन के रूप में यादों में बसा रहेगा। मैं इस सभा में उसी भावना के साथ उपस्थित हूँ!

* इस विधायिका ने एक सदी पहले सामाजिक न्याय की आधारशिला रखी थी।

* इस विधानसभा द्वारा हमारे भारतीय संविधान में पहला संशोधन किया गया था।

* इस विधानसभा ने पिछड़ों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण, धार्मिक अल्पसंख्यक के आंतरिक आरक्षण और अरुंधतियार समुदाय के आंतरिक आरक्षण के माध्यम से सामाजिक न्याय स्थापित किया।

* इस विधानसभा ने संघ को मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए विवश किया, जो अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण प्रदान करता है।

* इस विधानसभा ने सरकारी स्कूल के छात्रों को – चिकित्सा शिक्षा में 7.5 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया है।

* इस विधानसभा ने इंजीनियरिंग सहित पेशेवर शिक्षा में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए 7.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित के हैं ।

* न केवल तमिलनाडु बल्कि समस्त भारत के लिए मेडिकल सीटों के अखिल भारतीय कोटे में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया है।

* इस विधानसभा ने देश में पहली बार तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण नीति लागू कर मील का पत्थर स्थापित किया है।

* इस विधानसभा ने सामाजिक न्याय को संविधान की नौवीं अनुसूची में सम्मिलित करके, इसकी कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जीत हासिल की।

* इसी विधायी मंडल ने मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश परीक्षा को समाप्त करने वाला क़ानून पारित किया है जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति ने मंजूरी  भी प्रदान की थी।

मद्रास उच्च न्यायालय और हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रवेश परीक्षा उन्मूलन अधिनियम को अक्षुण्ण भी रखा गया है।

* तमिलनाडु में प्रवेश परीक्षाओं को समाप्त करने वाले विधेयक पर राष्ट्रपति की सहमति दस वर्षों के लिए प्रभावी थी। हमने बारहवीं कक्षा के प्राप्तांकों की के आधार पर इंजीनियरिंग और चिकित्सा शिक्षण संस्थानों में छात्रों का नामांकन किया। ग्रामीण और शहरी दोनों पृष्ठभूमि के हजारों विद्यार्थी डॉक्टर और इंजीनियर बने और वे अभी भी जनता की सेवा कर रहे हैं।

मैं उस सदन में खड़ा हूँ जिसने सामाजिक न्याय, कानूनी न्याय, उत्पीड़ित लोगों के अधिकारों, तमिल जातीय समुदाय और उसकी भाषा की महानता को अक्षुण्ण रखने में सफलता की आधारशिला रखी है। और मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि “यह सभा NEET के सामाजिक अन्याय को निश्चित रूप से समाप्त कर सकती है और यह अवश्य करेगी।

माननीय अध्यक्ष महोदय!

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (कषगम) के सरकार में आने के आठ महीने बाद हमने आज विधानसभा की विशेष बैठक बुलाई है। इसी प्रकार, मुख्यमंत्री पेरारिग्नर (पेरअरिंजर) अण्णा ने 23 जनवरी, 1968 को पदभार ग्रहण करने के कुछ ही महीनों बाद विशेष सभा बुलाई थी। हमारे महान नेता पेरारिग्नार (पेरअरिंजर) अण्णा ने ऐतिहासिक घोषणा करते हुए दो-भाषा नीति को प्रस्तुत किया और हमारे भाषाई अधिकारों के संरक्षण की प्रक्रिया को जारी रखते हुए तमिलनाडु के छात्रों की भाषाई मांग का निराकरण किया।

भारत जैसे एक बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहु-सभ्यता वाले देश में आधिकारिक भाषा के रूप में केवल एक क्षेत्रीय भाषा को अपनाना, भारत की एकता और अखंडता को कमजोर करेगा; क्योंकि यह माना जाता है कि एक भाषा क्षेत्र अन्य सभी भाषा क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लेगा। हमारा संकल्प था कि तमिल और अन्य प्रांतीय भाषाओं को संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया जाए और संविधान में विधिवत संशोधन किया जाए। प्रस्ताव में कहा गया था कि तब तक अंग्रेजी राजभाषा बनी रहनी चाहिए। सदन अनुशंसा करता है कि “भाषाओं के उपयोग संबंधी उल्लेख वाले भारत के संविधान के अनुच्छेद को तदनुसार परिवर्तित किया जाए।” इसने “तमिलनाडु के सभी स्कूलों से त्रि-भाषा नीति को हटाने” का भी संकल्प लिया। सदन केवल तमिल और अंग्रेजी को छोड़कर, हिंदी भाषा को पूर्ण रूप से समाप्त करने का संकल्प करता है।

 

आज हम इस विशेष सभा में अपने नेता अण्णा के पदचिन्हों पर चलते हुए समूचे देश के लिए शिक्षा में सामाजिक न्याय की नीति प्रस्तावित करने हेतु उपस्थित हुए हैं।

हम सभी यहाँ एकत्रित हुए हैं ताकि सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए एकजुटता के साथ काम करते हुए चिकित्सा शिक्षा की आम छात्रों की आकांक्षाओं को पूरा करें।

इस ऐतिहासिक सभा की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के क्रम में हम यहां इस विधायिका को संविधान प्रदत्त विधायी शक्ति की रक्षा हेतु उपस्थित हुए हैं, जो आठ करोड़ लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, और जिसने सदी के महत्वपूर्ण और गौरवशाली नीतिगत निर्णयों का सृजन किया है।

NEET परीक्षा संविधान द्वारा स्थापित प्रणाली नहीं है। इसे संविधान का अंग नहीं बनाया गया था। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने NEET परीक्षा को अनिवार्य किया था।

जब 2010 में इस प्रकार की परीक्षा का प्रस्ताव दिया गया था, तब तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुथमिज़हरीनार कलैग्नर ने इसका कड़ा विरोध किया था।

इसका कई भारतीय राज्यों ने विरोध भी किया था। इस परीक्षा को पूरे भारत में 115 मामलों के जरिये चुनौती दी गई। तमिलनाडु वह राज्य था जो इस दिशा में नेतृत्व कर रहा था। इन सभी मामलों की सुनवाई उच्चतम न्यायालय ने की थी.

NEET परीक्षा को उच्चतम न्यायालय ने 18 जुलाई 2013 को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने यह निर्णय सुनाया। बाद में भारतीय उपमहाद्वीप में NEET परीक्षा को समाप्त कर दिया गया।

हालांकि, भाजपा के चुनाव जीतने और सरकार बनने के बाद एक निजी प्रशिक्षण संस्थान ने मामले को फिर से खोल दिया। NEET परीक्षा के मामले में उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई की। उच्चतम न्यायालय ने 24.5.2016 को मामले की सुनवाई के बाद कहा, “पूर्व निर्णय वापस लिया गया है” और “इस मामले को नए सिरे से सुनेंगे।” इस आधार पर, भाजपा नीत केंद्र सरकार ने 11 अप्रैल, 2016 को एक अध्यादेश जारी किया, जिससे पूरे देश में NEET को तुरंत लागू कर दिया गया।

NEET परीक्षा से निजी प्रशिक्षण संस्थानों को लाभ होता है। इन परीक्षाओं के माध्यम से वे छात्रों से लाखों रुपये ऐंठते हैं। इस परीक्षा से इन संस्थानों को भरपूर मुनाफ़ा हो रहा है।

NEET छूट विधेयक उन लोगों के लाभ हेतु प्रस्तुत किया जा रहा है जो कोचिंग के लिए इतना भुगतान नहीं कर सकते। NEET परीक्षा गरीब और निर्धन बच्चों की शिक्षा के अधिकार के लिए एक बाधा है। डॉक्टर बनने के उनके सपने के बीच NEET नाम की एक दीवार खड़ी कर दी गई है। NEET उन बच्चों से कहता है, “तुम डॉक्टर नहीं बन सकते।” यह प्रगति को रोकते हुए कहता है, “तुम इसके लायक नहीं हो।” इसलिए NEET छूट विधेयक प्रस्तुत किया गया है। मुझे नहीं लगता कि मुझे इस सभा में उस परीक्षा की असामान्यताओं के बारे में विस्तार से बताने की आवश्यकता है।

* NEET परीक्षा में नकल करने के आरोप में 2019 में चार लोगों को और 2020 में पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया। केंद्र सरकार ने लोकसभा को सूचित किया है कि 2021 में NEET परीक्षा में 15 लोगों ने धोखाधड़ी की।

प्रतिरूप बनाना, प्रश्न पत्रों की चोरी करना और उत्तर पुस्तिकाओं के साथ छेड़छाड़ करना कुछ ऐसे ही धोखाधड़ी और जालसाजी हैं जो घटित हुई हैं। इस पर सीबीआई ने मामला भी दर्ज किया है।

* NEET परीक्षा धोखाधड़ी के संबंध में, न केवल तमिलनाडु में बल्कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में भी कई मामले दर्ज किए गए हैं। एक छात्र उदित सूर्या और उसके पिता वेंकटेश को छद्मवेश में परीक्षा देने के लिए हिरासत में लिया गया था। एक एजेंट, 5 छात्र और उनके 6 माता-पिता समेत कुल 12 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है। हमारे राज्य के CBCID द्वारा दस लोगों के चित्र प्रकाशित किए गए हैं, जिन्होंने परीक्षा में प्रतिरूप बनाया और छल किया है।

मद्रास उच्च-न्यायालय में कोयंबटूर के एक छात्र ने केस दायर किया कि “मैंने 5 अक्टूबर को इंटरनेट पर देखा तब मुझे 700 अंकों में से, 594 अंक प्राप्त हुए थे। इसे 17 अक्टूबर को 248 दर्शाया गया।” इसी वजह से उन्होंने मुकदमा डाला है। परीक्षकों ने अनुरोध किया कि मामले को और स्पष्टीकरण के बिना खारिज कर दिया जाए। मद्रास उच्च न्यायालय ने 9.2.2021 को पूछा NEET की उत्तरपुस्तिका में धोखाधड़ी का मामला सीबीआई को क्यों नहीं भेजा जाए?

* एक अन्य छात्रा ने दावा किया कि उसकी प्रतिक्रिया पत्रक में हेराफेरी की गई थी और उसने केवल एक प्रश्न अनुत्तरित छोड़ा था, जबकि उत्तर पत्रक फ़र्ज़ी था क्योंकि उसमें उसके 11 प्रश्न अनुत्तरित थे।

* 3 दिसंबर, 2021 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में खुलासा किया कि NEET परीक्षा घोटाले में लिप्त 15 छात्रों को अयोग्य घोषित कर दिया गया।

* 29 सितंबर, 2021 को छात्रों के एक समूह ने उच्चतम न्यायालय में मुकदमा दायर किया। उनका कहना था 12 सितंबर को हुई NEET परीक्षा में बहुत से लोगों ने धोखाधड़ी की है। प्रतिरूप बनाकर परीक्षा लिखी गई परिणामस्वरूप परीक्षा रद्द कर दी जानी चाहिए।

अर्थात्, संक्षेप में कहा जाए तो, NEET परीक्षा कोई शुध्द माध्यम नहीं है; यह कम आय वाले परिवारों के छात्रों को योग्यता की आड़ में हाशिए पर डालने का प्रयास करता है। परिणामस्वरूप, हम परीक्षा का विरोध करते हैं और छूट की मांग करते हैं।

इसे ‘NEET परीक्षा’ के बजाय ‘छात्र हत्या परीक्षा’ कहा जाना चाहिए। NEET एक परीक्षा नहीं है; यह एक बलिवेदी है। भारत की भावी पीढ़ी अरियालुर अनीता सहित हमारे कई प्रिय छात्रों की मृत्यु हो चुकी है। न केवल उनके माता-पिता ने अपना उत्तराधिकारी खोया; अपितु हमने भी खोया! तमिलनाडु ने ही नहीं, संपूर्ण भारत ने खोया!

मैं इस मंच में जिस प्रश्न को संबोधित करना चाहता हूँ वह यह है कि क्या NEET परीक्षा, जिसने कुछ छात्रों को श्मशान और अन्य को जेल भेज दिया है, वास्तव में आवश्यक है। यह एक ऐसा सवाल है जिसे पूरे छात्र समुदाय के साथ-साथ अभिभावकों ने भी उठाया है।

इसलिए हमने NEET से छूट वाला कानून पारित किया। हम अत्यधिक सावधानी के साथ संवाद करना चाहते हैं। NEET परीक्षा से छूट, जिसने कई छात्रों के डॉक्टर बनने के सपनों को बर्बाद कर दिया है, तमिलनाडु के छात्रों की अवश्य मदद करेगी।

हमने 10.6.2021 को उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश डॉ. ए.के. राजन के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया था जो विषय की जांच करेगी और गरीब और पिछड़े छात्रों पर NEET परीक्षा के प्रभावों पर एक रिपोर्ट तैयार करेगी। समिति ने जनता से परामर्श किया गया। उन टिप्पणियों के आधार पर समिति ने 14.7.2021 को सरकार को 193 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी। उन्होंने दावा किया कि सरकारी स्कूल के छात्र चिकित्सा शिक्षा हासिल करने के अपने सपने को पूरा करने में असमर्थ हैं। कुछ का दावा है कि NEET उत्कृष्ट है, हालांकि तथ्यों के आधार पर समिति का दावा है कि इस परीक्षा में योग्यता और कौशल से भी समझौता किया जाता है।

मैंने इस रिपोर्ट पर विस्तृत अनुशंसा देने के लिए मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक समिति बनाई है। सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद, तमिलनाडु को NEET परीक्षा से छूट देने वाला विधेयक इस विधानसभा द्वारा पारित किया गया था। हमने काफी अध्ययन किया और तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर इस बिल को पारित करने में सफल रहे।

चार भाजपा सदस्यों को छोड़कर, इस सदन के सभी सदस्यों के समर्थन से NEET छूट विधेयक पारित किया गया था। यह विधेयक न केवल समग्र रूप से तमिलनाडु की भावनाओं को दर्शाता है, बल्कि विधानसभा की संप्रभुता की धारणा को भी पेश करता है।

इसे माननीय राज्यपाल द्वारा अनुमोदित किया जाना था, और उन्हें इसे माननीय राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए भेजना चाहिए था। इसके बजाय, उन्होंने निर्णय पर पहुंचने से पहले – हमारे कई अनुरोधों के बावजूद – इसे 142 दिनों तक रखा और फिर इसे हमें वापस कर दिया। इस सदन में, मुझे स्पष्ट रूप से कहना होगा कि उन्होंने बिल को अस्वीकार करने के लिए जिन कारणों का हवाला दिया, वे गलत थे।

* राज्यपाल ने कहा कि NEET परीक्षा के अध्ययन के लिए तमिलनाडु सरकार द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति एके राजन समिति की रिपोर्ट अनुमानों पर आधारित थी।

10.6.2021 को, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के जीओ (GO) नंबर 283 द्वारा न्यायमूर्ति एके राजन समिति का गठन किया गया था। समिति शिक्षाविदों और सरकारी अधिकारियों से बनी थी। इस उच्च स्तरीय समूह द्वारा अध्ययन की शर्तों को भी सार्वजनिक किया गया था। जनता से कमेटी को फीडबैक देने को कहा गया। विभिन्न स्थानों पर लगाए गए ईमेल, मेल और याचिका पेटियों द्वारा सैकड़ों हजारों लोगों ने आयोग को अपनी राय व्यक्त की थी।

14.7.2021 को 86,342 लोगों से विभिन्न तरीकों से एकत्रित विचारों का विश्लेषण कर न्यायमूर्ति एके राजन समिति ने सरकार को अपनी संपूर्ण अनुशंसाओं को प्रस्तुत किया। यानी यह रिपोर्ट कुछ लोगों के अनुमानों के बजाय करीब एक लाख लोगों की राय पर आधारित थी।

*अनुशंसा के अनुसार, NEET परीक्षा ने चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने और सामाजिक-आर्थिक रूप से समृद्ध वर्गों की तुलना में वंचितों की इच्छा को बाधित कर एमबीबीएस और उच्च चिकित्सा पाठ्यक्रमों में सामुदायिक प्रतिनिधित्व की विविधता को सीमित कर दिया है। यह भी अनुमान नहीं है। इसके आंकड़े रिपोर्ट में भी देखे जा सकते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, सरकारी स्कूली बच्चे, जिनके माता-पिता की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपये से कम है और पिछड़े (बीसी), अत्यंत पिछड़े (एमबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) व अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग से हैं, सबसे अधिक प्रभावित हैं।

* राज्यपाल ने NEET परीक्षा “मेरिट के विरुद्ध” होने का दावा करने के लिए अध्ययन की आलोचना की है। गौरतलब है कि जस्टिस एके राजन की कमेटी की रिपोर्ट में इसे खारिज करने वाले सिद्ध तथ्य सम्मिलित हैं।

शोध के अनुसार सरकारी स्कूलों में तमिल माध्यम से पढ़ने वालों को भी नुकसान हो रहा है।

इस बिंदु पर, मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि तमिलनाडु सरकार के 7.5 प्रतिशत आरक्षण और NEET परीक्षा से लाभान्वित हुए विद्यार्थियों की इस दृष्टि से गिनती नहीं की जानी चाहिए।

* राज्यपाल के अनुसार, पढाई  में भौतिकी, रसायन विज्ञान या जैविक अध्ययन क्षमता का कोई उल्लेख नहीं है। इन तीनों विषयों का अध्ययन बारहवीं कक्षा की परीक्षा देने वाले सभी विज्ञान के छात्रों द्वारा किया जाता है। परिणामस्वरूप, बारहवीं कक्षा में इन तीन विषयों में उत्कृष्टता प्राप्त करने वालों को ही सर्वश्रेष्ठ ग्रेड प्राप्त होते हैं। परिणामस्वरूप, हम बारहवीं कक्षा के अंक को पर्याप्त मानते हैं। हम मानते हैं कि एक और परीक्षा अनावश्यक है। NEET परीक्षा से पहले 90% से अधिक सीटें उन छात्रों द्वारा भरी गई थीं, जिन्होंने राज्य पाठ्यक्रम से पढ़ाई की थी। हालांकि, NEET परीक्षा के बाद से, मेडिकल कॉलेजों में जाने वाले सरकारी स्कूलों के नामांकित छात्रों की संख्या में नाटकीय रूप से कमी आई है।

राज्य बोर्ड के पाठ्यक्रम के तहत अध्ययन करने वालों छात्रों की पुस्तकों से प्रश्न पत्र प्रकाशित करने से इनकार करना वैसा ही भेदभाव है, जैसा अश्वेतों को प्रवेश देने से इनकार करने वाला पूर्वाग्रह।

*NEET एक शिक्षा प्रणाली नहीं है, यह एक कोचिंग प्रणाली है। यह सिर्फ निजी प्रशिक्षण केंद्रों के कारोबार को बढ़ावा देगी। यह उन लोगों का एक नया वर्ग बनाता है जो अनुकूलित कोचिंग प्राप्त करने में असमर्थ हैं। आर्थिक रूप से वंचित, निर्धन बच्चे दो से तीन वर्ष तक निजी ट्यूशन का खर्च कैसे उठा सकते हैं, जिसकी लागत लाखों में हो सकती है? यही वह प्रश्न है जिस पर हम वापस आते रहते हैं। इक्कीसवीं सदी में सबसे बड़ी अस्पृश्यता यह तथ्य है कि जो लोग प्रशिक्षण के लिए भुगतान नहीं कर सकते वे मेडिकल स्कूल में प्रवेश नहीं कर सकते – केवल वे जो दो से तीन वर्ष के प्रशिक्षण के लिए भुगतान कर सकते हैं, वे ही ऐसा कर सकते हैं! क्या योग्यता के आधार पर इस छुआछूत को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए? इसलिए हम NEET छूट विधेयक फिर से प्रस्तुत कर रहे हैं। राज्यपाल ने वेल्लोर क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के मामले का हवाला दिया। सवाल यह है कि क्या NEET अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। उस मामले का राज्य विधायिका की विधायी शक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। परिणामस्वरूप, इसका उस मामले या NEET छूट विधेयक पर कोई असर नहीं पड़ता है जिसे हम प्रस्तावित कर रहे हैं।

मॉडर्न डेंटल हॉस्पिटल बनाम मध्य प्रदेश सरकार के मामले में उच्चतम न्यायालय की पांच जजों की बेंच ने सुनवाई की. उच्चतम न्यायालय का निर्णय स्पष्ट था: राज्य सरकार के पास उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के प्रवेश पर कानून बनाने की शक्ति है।

इसी मामले में न्यायमूर्ति भानुमती द्वारा दिए गए एक अलग फैसले में, उन्होंने यह भी निर्णय सुनाया कि छात्र प्रवेश को नियंत्रित करने वाला कानून राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में था। हमने केवल राज्य विधायिका की विधायी शक्ति का उपयोग करके NEET परीक्षा के विरुद्ध विधेयक पारित किया।

* राज्यपाल ने आग्रह किया है कि NEET परीक्षा को संविधान द्वारा अनिवार्य बनाया जाए। संविधान के अनुसार केवल सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचितों के अधिकारों के लिए कोई भी कानूनी प्रावधान किया जा सकता है।

हम उसी आधार पर यह NEET छूट बिल वापस ला रहे हैं। संविधान भेदभाव विरोधी है। हालांकि, NEET परीक्षा स्वाभाविक रूप से भेदभावपूर्ण है।

संवैधानिक कानून में सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया है। वहीं, NEET सामाजिक न्याय के विरुद्ध है। “कानून का न्याय” शब्द का प्रयोग संवैधानिक कानून में किया जाता है। लेकिन NEET पैसे का पक्षधर है। भारतीय संविधान समानता के सिद्धांत पर बना है। दूसरी ओर, NEET समानता के विपरीत है। NEET संविधान के सभी मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है। इसलिए हम NEET परीक्षा में छूट का अनुरोध कर रहे हैं।

मेरा दर्द, एक भयानक परीक्षा के बारे में इतने लंबे समय तक बहस करने से उपजा है जो गरीब और ग्रामीण छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। हालांकि, जिन्हें समझने की आवश्यकता है, वे अभी भी हैरान हैं।

पेरारिग्नर (पेरअरिंजर) अण्णा, जब वे हमारे मुख्यमंत्री थे, उन्होंने एक केंद्रीय मंत्री के साथ कल्लाकुरिची चीनी कारखाने के मुद्दे पर फोन पर बात की। अण्णा के अनुसार, दूसरी ओर के वक्ता को ‘कल्लाकुरिची’ शब्द को समझने में 15 मिनट का समय लगा।

पिछले पांच सालों से हम NEET के सबसे खराब भाग के बारे में बता रहे हैं। हालांकि, वे अभी भी भ्रमित हैं। वास्तव में, यह विश्वास यही विश्वास करने लायक है कि वे समझने से इनकार कर रहे हैं। लेकिन मैं इस सभा में घोषणा करता हूँ कि जब तक हम जीत नहीं जाते, तब तक हम अपनी लड़ाई नहीं छोड़ेंगे।

माननीय अध्यक्ष महोदय!, जैसा कि मैंने शुरू में कहा था, यह केवल एक परीक्षा उत्तीर्ण करने का मामला नहीं है। मैं यह भी नहीं मानता कि यह मामला सिर्फ इसलिए है क्योंकि हमने एक विधेयक पारित किया और राज्यपाल ने इसे वीटो कर दिया। मुझे यह भी पता है कि कोई भी इसे इस प्रकार नहीं देखेगा। इस विधेयक की वापसी ने हमारे राज्य तमिलनाडु के अधिकार पर संदेह जताया है। इस विधायिका की संप्रभुता पर सवाल उठाया गया है। राज्यों की स्वायत्तता पर सवाल उठाया गया है। यही वह भाग है जो पीड़ादायक है। यही मुझे चिंतित करता है। यदि तमिलनाडु विधान सभा का विधेयक, जो भारतीय उपमहाद्वीप में सभी राज्य विधानसभाओं के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य करता है, उसे वापस भेज दिया जाता है, तो इस भारतीय उपमहाद्वीप के राज्यों का क्या होगा? संघ और राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक रूप से अनिवार्य संबंधों का क्या होगा? विभिन्न जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोगों के अधिकार और जिम्मेदारियों का क्या होगा?

क्या यह लोकतांत्रिक दर्शन के विरुद्ध नहीं है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार के नीतिगत फैसलों को बिना किसी सम्मान के, राज्यपाल द्वारा, खारिज कर दिया जाए, जो केवल एक मनोनीत पद धारण करते हैं? फिर लोग किस उम्मीद में वोट करेंगे, वे क्यों वोट देने जा रहे हैं, ये ऐसे सवाल हैं जिन पर हमें ध्यान देना चाहिए।

हमारे भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता “विविधता में एकता” है। क्या इसे विकृत करना संभव है? जो लोग इसके बारे में सोचना जानते हैं, उनकी सोच का दायरा विशाल होना चाहिए। क्या मजबूत सरकार या ईमानदार सरकार होना ही बेहतर है? कौन सा सबसे अधिक पसंद करने योग्य है? निःसंदेह हर कोई एक ईमानदार सरकार चाहता है। मजबूत साम्राज्य केवल इतिहास की किताबों में मौजूद हैं। हालाँकि, यह सम्राट अशोक ही थे जो भेदभाव विरोधी थे और आज भी उन्हें याद किया जाता है।

अफसोस की बात है कि भारत के संघीय दर्शन को अस्थिर करने के प्रयास में हाल के दृश्यों का मंचन किया गया है, जिसमें एक विविध आबादी सम्मिलित है। इस बार, मैं अतीत पर विचार कर रहा हूँ। कुछ का मानना ​​है कि द्रविड़ आंदोलन का एकमात्र उपहार सामाजिक न्याय है। द्रविड़ आंदोलन ने हमें राज्य की स्वायत्तता भी उपहारस्वरूप दी है। जस्टिस पार्टी के नेता टी.एम. नायर ने 2 अक्टूबर, 1918 को इंग्लैंड में संसद के दोनों सदनों को संबोधित किया। 1917 की शुरुआत में, उन्होंने भाषाई राज्यों को स्वर प्रदान किया। उन्होंने राज्यों को अधिकार के हस्तांतरण की भी वकालत की। उन्होंने ही दावा किया कि संघीय व्यवस्था के सफल होने का यही एकमात्र तरीका है। दिग्गज नेता टीएम नायर आज याद आ रहे हैं। उन्हें यह कहे हुए 100 वर्ष हो गए हैं। इसके बावजूद, हम राज्य के अधिकारों की लड़ाई जारी रखे हुए हैं!

पेरअरिंजर अण्णा ने बजट आवंटन के मसौदे पर 15.7.1967 को टिप्पणी की “केंद्र और राज्य  में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो सरकारों के बीच संवैधानिक और व्यावहारिक संबंधों को संशोधित किया जाना चाहिए। इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़े तो भी किया जाए। मैं इस पर गौर करने के लिए एक समिति की स्थापना की मांग करने के लिए बाध्य हूँ। इस प्रकार आवाज बुलंद कर पेरअरिंजर अण्णा ने मुझे अवाक कर दिया।

मुझे याद है कि कलैग्नर ने 22.9.1969 को मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, राजमन्नार की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी, ताकि वे ‘राज्य स्वायत्तता के आधार पर केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा इस प्रकार करें जो देश की एकता के लिए हानिकारक नहीं हो।”

27.5.1971 को राजमन्नार समिति की रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सौंपी गई थी। उन्होंने रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद लिखा, “ये महत्वपूर्ण मुद्दे हैं और हम सभी मुख्यमंत्रियों से परामर्श करने का इरादा रखते हैं” – इस सदन के पत्रों से गुजरते हुए, मुझे 22.6.1971 को प्राप्त पत्र को देखकर खुशी हुई। सबसे बढ़कर, मैं इस विधानसभा के लंबे इतिहास का भाग बनकर खुश हूँ, 16.4.1974 को प्रस्तुत किए गए और 20 अप्रैल को पारित राज्य स्वायत्तता प्रस्ताव के ऐतिहासिक तर्कों को फिर से पढ़ रहा हूँ।

विशेष रूप से, प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है, “विधानसभा तय करती है कि स्वायत्त राज्यों यानी ‘संघीय केंद्र और स्वायत्त राज्यों’ के साथ वास्तव में संघीय प्रणाली बनाने के आधार पर राजमन्नार समिति की रिपोर्ट को अपनाकर संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए।” ये वाक्यांश किसी और ने नहीं बल्कि हमारे तमिलों के नेता, डॉ कलैग्नर द्वारा प्रस्तावित किए गए थे। केंद्र में सत्ता केंद्रित होने पर राज्यों को क्यों रोका जाना चाहिए? आज मुझे इस विकट समस्या के स्थायी समाधान के रूप में इस भव्य सदन में इस संकल्प को प्रस्तावित करने में कलैग्नर के दृष्टिकोण पर भरोसा करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

आज मुझे इस भव्य सदन में इस कभी न समाप्त होने वाले प्रश्न के स्थायी समाधान के रूप में इस संकल्प को प्रस्तावित करने में कलैग्नर के दृष्टिकोण पर भरोसा करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

उस दिन, हमारे तमिलों के नेता, कलैग्नर ने घोषणा की, “भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में तमिलनाडु सरकार की ओर से हमने जो यह मशाल जलाई है, उससे सभी को प्रकाशमान करना चाहिए।” आज हम यही उम्मीद कर रहे हैं।

हम NEET छूट विधेयक राज्यपाल को लौटाकर भारत के लिए ही मशाल जला रहे हैं। भले ही उस समय अन्नाद्रमुक सत्तारूढ़ दल थी, विपक्ष के रूप में द्रमुक एकजुट हो गया और सर्वसम्मति से 1.2.2017 को इसी सदन में NEET छूट विधेयक पारित किया गया।

राष्ट्रपति को सहमति के लिए भेजे बिना, बिल को 27 महीने के लिए तक रोके रखा गया। आखिरकार इसे वापस कर दिया गया। NEET छूट के लिए एक और विधेयक उस समय पारित किया और भेजा जा सकता था। लेकिन वह मौका हमने गँवा दिया।

जब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सत्ता में आई, तो सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति ए.के. राजन समिति का इसी संदर्भ में का गठन किया गया। हमने समिति की रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद, 13 सितंबर, 2021 को तमिलनाडु को NEET परीक्षा से मुक्त करने के लिए विधेयक पारित किया। राज्यपाल का संविधान के तहत क्या अधिकार है? इसे व्यक्त करने के बजाय, मैं इस सदन में यह बताना चाहूँगा कि सरकारिया आयोग, जिसे संघ-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए स्थापित किया गया था, ने क्या कहा है।

* समवर्ती सूची की सामग्री पर राज्य विधानमंडल का विधायी क्षेत्राधिकार संविधान की धारा 254 – (1) द्वारा संरक्षित है। राज्य मंत्रिमंडल राज्यपाल को सलाह दे सकता है कि वह राज्य विधायिका द्वारा पारित कानून को राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजे, यदि वह संसद द्वारा पारित कानून का खंडन करता है। राज्यपाल राज्य मंत्रिमंडल की सलाह के अनुसार कार्य करेंगे। यदि संविधान के अनुच्छेद 254 (1) के तहत राज्य विधान सभा द्वारा कोई कानून पारित किया जाता है, तो संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत इसे अनुमोदित करने की शक्ति का उपयोग मंत्रिपरिषद के निर्णय के अनुसार किया जाता है। (राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह का पालन करना चाहिए।)

राज्यपाल को अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं के आधार पर कानून को अस्वीकार नहीं करना चाहिए; इसके बजाय, उन्हें कैबिनेट की सलाह का पालन करना चाहिए।

ठीक ऐसा ही 2006 में राज्यपाल ने किया था, जब तमिल नेता कलैग्नर मुख्यमंत्री थे, और जब इस विधानसभा ने प्रवेश परीक्षा को हटाने के लिए कानून बनाया था।

हमने 13.9.2021 को हमारे पास मौजूद शक्ति के आधार पर छात्रों को NEET परीक्षा से छूट देने के लिए एक विधेयक पारित किया। राज्यपाल को संविधान के तहत कानून इसे राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत करना आवश्यक है। मैं उम्मीद करता हूँ कि राज्यपाल अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन करेंगे। यह राज्यपाल की जिम्मेदारी है, जो लोगों द्वारा चुनी हुई विधायिका की विधायी शक्ति द्वारा सीमित है। मैं व्यक्तिगत रूप से गवर्नर हाउस गया क्योंकि उन्होंने अपना काम नहीं किया था। मैंने महामहिम राज्यपाल से गुहार लगाई। वरिष्ठ मंत्री, श्री दुरईमुरुगन ने भी राज्यपाल से भेंट की और उनसे आग्रह किया। हमारे सभी नीति निर्माताओं और जन प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति से मिलने और उन्हें एक ज्ञापन देने का का प्रयास किया। वे केंद्रीय गृह मंत्री से मिले और प्रयास जारी रखा। इस संदर्भ में राज्यपाल का अनुरोध था कि प्रथम बार भेजे जाने के 142 दिन बाद विधानमंडल NEET छूट विधेयक पर फिर से विचार करे।

इस अभूतपूर्व परिस्थिति में, हमने शनिवार, 5 फरवरी, 2022 को सभी विधानसभा दल के नेताओं की एक बैठक बुलाई, क्योंकि महामहिम राज्यपाल ने संविधान के अनुच्छेद 254 (1) द्वारा विधानमंडल को दी गई विधायी शक्ति पर सवाल उठाने का काम किया। इसमें पारित प्रस्ताव के आधार पर मैं आज फिर से NEET छूट विधेयक का प्रस्ताव करता हूँ।

पेरअरिंजर अण्णा ने 30.3.1967 को राज्यपाल के अभिभाषण पर बहस को संबोधित करते हुए उसी मंच से टिप्पणी की थी “मुझे बहुत खुशी है कि लोगों का एक वर्ग आज उसी दृष्टिकोण पर आ गया है, जब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने पहली बार दावा किया था कि राज्यपाल की कोई आवश्यकता नहीं है।” मुझे वह टिप्पणी आज बरबस याद आ रही है।

मुझे उम्मीद है कि हमारे राज्यपाल तमिलनाडु के लोगों की भावनाओं का सम्मान करेंगे और अनजाने में ऐसी-वैसी स्थिति नहीं बनाएंगे और तमिलनाडु के छात्रों के सर्वोत्तम हित में राष्ट्रपति को अविलम्ब NEET छूट विधेयक भेजेंगे, जिसे संविधान द्वारा विधायिका के चुने गए लोगों को प्रदत्त शक्ति के तहत पुन: पारित किया जाएगा। लंबे समय से लंबित शिक्षा के अधिकार की रक्षा के साथ ही साथ तमिलनाडु के राज्य अधिकारों और अनुसूचित जातियों, आदिवासियों, पिछड़े-अति-पिछड़े-उत्पीड़ितों, गरीबों, हाशिये पर पड़े और ग्रामीण समाज के लोगों के सामाजिक अधिकारों की रक्षा हेतु मैं सभी से इस विधेयक का समर्थन करने का आग्रह करता हूँ।

पेरअरिंजर अण्णा के, “भारत के संविधान में संशोधन करना ताकि राज्यों को अधिक शक्तियां मिल सकें” के लक्ष्य को प्राप्त करने और कलैग्नर के “संघीय केंद्र और स्वायत्त राज्य” के नारे को चरितार्थ करने के लिए यह महत्वपूर्ण दिन है।

मैं – और आप – इस विधेयक को प्रस्तुत करके और इसके समर्थन में मतदान करके भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखेंगे। परिणामस्वरूप, भारत एकल राज्य नहीं बनेगा। संप्रभुता एक लोकतंत्र में विधायिका की विधायी शक्ति है। मैं माननीय अध्यक्ष महोदय के प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे संवैधानिक संरचना में इस प्रकार के एक ऐतिहासिक दिन बनाने में मदद करने की अनुमति दी, साथ ही उन सभी महान तमिल लोगों के लिए जिन्होंने मुझे महान जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया है। भारतीय राज्यों के अधिकारों की रक्षा हेतु।’

इस बारे में आपका क्या सोचना है, कमेंट में अपनी राय लिखें।

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