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फिर सामने आया योगी का ठाकुरवाद, खुद के ठाकुर होेने पर दिया ये बयान !

06:01 PM Jan 29, 2022 IST | Sumit Chauhan
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जाति ना पूछे साधू की, पूछ लीजिए ज्ञान इस दोहे के ज़रिए संत कबीर ये कहते हैं कि साधु-संतों की कोई जाति नहीं होती, उनकी जाति का नहीं बल्कि उनके ज्ञान का मोल कीजिए लेकिन यूपी में मामला कुछ अलग है। यहां ख़ुद को योगी कहने वाले मुख्यमंत्री को ना सिर्फ अपनी जाति पर घमंड है बल्कि वो इस जातीय घमंड को जायज़ तक ठहराते हैं।

जाति पर स्वाभिमान करना चाहिए – योगी 

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हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से जब ये पूछा गया कि आपके बारे में जब ये कहा जाता है कि आप राजपूतों की पॉलिटिक्स करते हैं तो क्या आपको दुख होता है? इस सवाल के जवाब में जो योगी ने कहा ‘नहीं कोई दुख नहीं होता। क्षत्रिय जाति में पैदा होना कोई अपराध थोड़े है। इस जाति में तो भगवान ने भी जन्म लिया है और बार-बार लिया है। हर व्यक्ति को अपनी जाति पर स्वाभिमान करना चाहिए’

अपनी जाति पर स्वाभिमान हर व्यक्ति को होना चाहिए। ये बात वो शख़्स बोल रहा है जो भगवाधारी है, ये बयान उस आदमी का है जो ख़ुद को सांसारिक मोह माया से दूर बताता है। ये जातिवादी बयान उस नेता का है जो यूपी के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा है। कबीर आज होते तो योगी से सबक़ लेते हुए लिखते, जाति ही पूछो साधु की, मत पूछिए ज्ञान क्योंकि योगी जैसे साधु-संतों की जाति भी होती है, उनका धर्म भी होता है और उनकी राजनीति भी होती है।

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ठाकुर अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी को ख़ुद के ठाकुर होने पर घमंड है, वो ये तक कहते है कि मेरी जाति में तो उनके भगवान भी पैदा हुए हैं। यानी मेरी जाति सबसे अच्छी है, ख़ुद भगवान इस जाति का प्रमाणपत्र लेने के लिए आतुर हैं। यानी यहाँ योगी आदित्यनाथ एक आदमी को उसके जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा बताने वाली घटिया जातिवादी व्यवस्था को सही ठहरा रहे हैं। ठाकुर अजय सिंह बिष्ट को जाति में कोई समस्या नज़र नहीं आती, उनके लिए जाति गर्व की बात है।

उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता कि जाति की समस्या ने हमारे देश का कितना नुक़सान किया है और कैसे जाति ने हमारे देश को हज़ारों टुकड़ों में बाँट रखा है? उन्हें उस पीड़ा का भी अनुभव नहीं होता जो दलितों-पिछड़ों ने जाति के नाम पर सही है।

योगी का ठाकुरवाद

वैसे योगी आदित्यनाथ का ठाकुरवाद कोई नई बात नहीं है। वो जिस तरह से ख़ुद के ठाकुर होने पर सामंती और जातिवादी सोच को ज़ाहिर करते हैं, वैसे ही उन्होंने अपनी सरकार के दौरान काम भी किए हैं। उन्होंने भर-भर कर ठाकुर अफ़सरों की नियुक्तियाँ कीं। दिसंबर 2021 में दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यूपी में 26% डीएम ठाकुर, 11% ब्राह्मण, 5% दलित हैं जबकि सिर्फ एक डीएम यादव है। 5 % से भी कम आबादी वाले ठाकुरों के 26 % डीएम योगी ने बना दिये। लेकिन अखिलेश यादव पर यादववाद का आरोप लगाकर यूपी में यादव डीएम की फेक न्यूज़ फैलाने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी और पीयूष बेवेले जैसे पत्रकार योगी के ठाकुरवाद पर क्रांति नहीं करते।

अखिलेश को यादवों का नेता और मायावती को दलितों की नेता कहने वाली मीडिया योगी को ठाकुरों का नेता नहीं कहती। उन्हें योगी के अंदर का जातिवाद और प्रशासन में फैला ठाकुरवाद नज़र नहीं आता। दलित-पिछड़े नेता जब अपनी जाति के दबे-कुचले लोगों के उत्थान की बात करते हैं, उनकी हकमारी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो मीडिया और सवर्ण ओपिनियन मेकर्स उन्हें जातिवादी घोषित कर देते हैं, उनपर जातिवाद करने का आरोप लगाते हैं लेकिन जब योगी जैसे लोग खुलेआम अपनी जाति के नाम पर घमंड करने की बात करते हैं, जाति देख-देखकर अफ़सरों की नियुक्ति करते हैं, जाति देख-देखकर सरकारी सुविधाओं की बंदरबाँट करते हैं, तब ऐसे लोगों के मुँह पर ताला लग जाता है।

जाति का विनाश और जाति पर घमंड

यूपी के सीएम से कोई पूछे कि आप पहले योगी हैं या ठाकुर तो मुमकिन है वो यही जवाब दें कि मैं पहले ठाकुर हूँ और बाद में योगी। क्योंकि उन्हें अपनी जाति पर गर्व है और वो बाक़ी लोगों से भी ऐसा गर्व करने की बात करते हैं। योगी जाति पर घमंड करने की बात करते हैं, वो जाति के विनाश की बात नहीं करते। अक्सर डॉ आंबेडकर की तस्वीरों के सामने हाथ जोड़ कर खड़े होने वाले ठाकुर अजय सिंह बिष्ट बाबा साहब को पढ़ते-लिखते नहीं हैं। क्योंकि अगर वो बाबा साहब के विचारों को समझते तो वो जाति के विनाश की बात करते।

अपनी पुस्तक जाति का विनाश में डॉ आंबेडकर लिखते हैं ‘जाति व्यवस्था नस्लों का विभाजन नहीं करती। जाति व्यवस्था एक ही नस्ल के लोगों के बीच सामाजिक विभाजन करती है। (पेज-61, फॉरवर्ड प्रेस) एक हिंदू के लिए उसकी जाति ही उसका समाज है। उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसकी जाति के प्रति है। उसकी वफ़ादारी उसकी जाति तक सीमित है। (पेज-76) आप जाति की नींव पर कोई भी इमारत खड़ी नहीं कर सकते। आप राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते. आप नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकते। जाति की नींव पर जो कुछ खड़ा किया जाएगा, उसमें दरार पड़ जाएगी। वह कभी साबुत नहीं रह सकता। (पेज-96,97) मेरा आदर्श एक ऐसा समाज होगा जो स्वतंत्रता और भ्रातृत्व पर आधारित हो। (पेज-77)’

बाबा साहब जाति के ख़ात्मे की बात करते हैं और योगी आदित्यनाथ का आरएसएस जातीय समरसता की बात करता है। योगी जैसे RSS वाले कहते हैं कि जातियां बनीं रहें, कोई दिक्कत नहीं। सभी जातियां आपस में मिल-जुलकर रहें। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ दलितों के घर जा-जाकर खाना खाकर यही संदेश तो देते हैं कि दलित दलित बना रहे और ठाकुर ठाकुर, वो ऐसे समाज की बात नहीं करते जहां कोई जाति ना हो। क्या जाति पर घमंड करना चाहिए ?

अब यहाँ एक ज़रूरी सवाल उठता है कि क्या जाति पर घमंड या गर्व करना चाहिए। बाबा साहब डॉ आंबेडकर जाति को एक बीमारी कहते थे और जाति को मानने वाले लोगों को वो मानसिक बीमार कहते थे। यानी जाति एक वायरस की तरह है और जो उसकी चपेट में होता है, वो दूसरों को भी संक्रमित कर देता है। बाबा साहब के इन विचारों के संदर्भ में अगर देखें तो जाति पर घमंड करने का कोई कारण नहीं है। भला कोई बीमारी पर भी घमंड करता है? आज के दिन कोई कहे कि मुझे गर्व है मुझे कोरोना वायरस हो गया? कोरोना वायरस के नए वैरिएंट से संक्रमित हर व्यक्ति को अपनी बीमारी पर गर्व करना चाहिए, तो आपको कैसा लगेगा? ज़ाहिर से बात है कि आप ऐसे व्यक्ति को मानसिक बीमार ही कहेंगे।

लेकिन अब आपके मन में ये सवाल आ रहा होगा कि बहुत से दलित-पिछड़े भी तो अपनी जाति पर गर्व करते हैं और उसे ज़ाहिर भी करते हैं, उनके बारे में क्या कहा जाए? यहाँ मैं आपको एक फ़र्क़ समझाना चाहूँगा। जब कोई पीड़ित व्यक्ति अपनी जाति के साथ स्वाभिमान को जोड़ता है तो असल में वो जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहा होता है क्योंकि हज़ारों साल से उसको जाति के नाम पर ही तो अपमानित किया गया है। ये उसका प्रतिरोध का तरीक़ा है, ये उसके विद्रोह की आवाज़ है। वो ऐसा करते हुए भी ख़ुद को ऊपर और दूसरों को नीचे नहीं मान रहा होता। असल में वो अपनी जाति पर शर्मिंदा होना छोड़ रहा होता है। जिस तरह से जाति पर घमंड नहीं किया जाना चाहिए, उसी तरह से जाति पर शर्मिंदा होने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। वो पीड़ित व्यक्ति उस शर्मिंदगी को छोड़ रहा होता है जो जाति पर घमंड करने वाले लोगों ने उसपर ज़बरदस्ती लाद दी थी। दोनों बातों में बुनियादी फ़र्क़ है और ये फ़र्क़ आपको समझना चाहिए।

जिस इलाहाबाद का नाम बदलकर योगी ने प्रयागराज कर दिया, उसी इलाहाबाद के एक मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का एक शेर है, हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता। कोई सिर्फ़ दलितों-पिछड़ों के दर्द की बात करते ही जातिवादी हो जाता है और कोई खुलेआम जातिवादी कुंठा ज़ाहिर करने के बाद भी प्रगतिशील बना रहता है। जाति पर गर्व करते हुए जातिवाद को कोसने का जो ये प्रीविलेज है, ये दलितों-पिछड़ों के पास नहीं होता।

ये विशेषाधिकार भी चंद जातियों के पास ही है। लेकिन उन जातियों के साथ-साथ आपके पास भी एक अधिकार है और वो है वोट देने का अधिकार। बाबा साहब ने आपको मताधिकार दिया है, उसका इस्तेमाल करें और सही सरकार चुने। हमारे चैनल को ज़रूर सब्सक्राइब करें।

 

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